आत्मा की प्रधानता का जीवन भोग
करना । ब्रम्ह की गरिमा का जीवन यापन । प्रकृतीय मोंह से मुक्त जीवन । इस स्थिति
का जीवन जीते मनुष्य ब्रम्ह में विलय के लिये सुपात्र बन जाता है । मनुष्य शरीर
द्वारा उत्थान के प्रयत्नों में यह चर्मोत्कर्ष उपलब्धि होती है ।
बुधवार, 31 दिसंबर 2014
मंगलवार, 30 दिसंबर 2014
ब्रम्हसंस्पर्षम्
जिस मनुष्य को अपनी आत्मा का सत्य
अनुभव मिल जाता है । उसकी आत्मा अपने को ब्रम्ह स्वरूप में लीन पाती है । उसका यह
अनुभव एक सत्य अनुभूति बन जाती है । इसी अनुभूति की स्थिति तक पहुँचाना ही धर्म
दर्शन का लक्ष्य होता है । मनुष्य शरीर द्वारा उत्थान के प्रयत्नों में यह
चर्मोत्कर्ष उपलब्धि होती है ।
सोमवार, 29 दिसंबर 2014
व्यापक स्वरूप
अपने को परम् सत्य को अर्पित करना । परम् सत्य
को अर्पित होने वाला भी परम् सत्य ही है । अर्पित करने वाला भी परम् सत्य ही है ।
परम् सत्य को पाना ही लक्ष्य है । जो व्यक्ति अपने को अर्पित करने वाले कर्मों में
परम् सत्य को उपरोक्त रूपों में अनुभव कर पाता है वह परम् सत्य का ज्ञाता बन जाता है । मनुष्य
शरीर द्वारा उत्थान के प्रयत्नों में यह चर्मोत्कर्ष उपलब्धि होती है ।
रविवार, 28 दिसंबर 2014
ब्रम्ह के समरूप
मनुष्य शरीर में विद्यमान परम्
सत्य का अंश प्रकृतीय मोंह में आसक्त है । आत्मा को विषेस प्रयत्नों के द्वारा यदि
व्याप्त प्रकृतीय मोंह से मुक्त किया जाय तो वह अपने मूल स्वरूप परम् सत्य की
गरिमा के समतुल्य हो जाता है । वह व्यक्ति इस पृथ्वी पर मनुष्य स्वरूप में परम्
सत्य का रूप बन जाता है । मनुष्य शरीर द्वारा उत्थान के प्रयत्नों में यह
चर्मोत्कर्ष उपलब्धि होती है ।
शनिवार, 27 दिसंबर 2014
सत्य आधार
इस नश्वर संसार के अस्तित्व का
सत्य आधार परम् ब्रम्ह के सत्य स्वरूप को जानना । इस संसार के समस्त रूपों में
परम् सत्य के विद्यमान रूप को सत्य रूप में जानना । यह इस संसार में मनुष्य शरीर
द्वारा उत्थान के लिये किये जा रहे प्रयत्नों की चर्मोत्कर्ष उपलब्धि होती है । इस
उपलब्धि द्वारा मनुष्य परम् सत्य में विलीन हो जाता है ।
शुक्रवार, 26 दिसंबर 2014
कर्म का लक्ष्य
कंचिद यदि परम् ब्रम्ह का ध्यान
करना असाध्य प्रतीत होवे । कंचिद यदि परम् ब्रम्ह का चिंतन करना, मस्तिष्क की विषयों में चंचलता के कारण सम्भव ना होवे । तो भी यदि किये जाने
वाले प्रकृति के समस्त कर्मों को परम् ब्रम्ह को अर्पित करके किया जाय तो परिणामत:
कर्ता परम् ब्रम्ह में विलीन हो जाता है ।
गुरुवार, 25 दिसंबर 2014
ब्रम्ह में विलय
परम् ब्रम्ह का स्मरण मस्तिष्क में
धारण कर, अपने पूर्ण विवेक को परम् ब्रम्ह में केंद्रित कर, परम् ब्रम्ह को जानना और पाना
अपने जीवन का लक्ष्य निर्धारित कर, परम् ब्रम्ह को ही अपनी भक्ति का वस्तु बना कर जो भी
मनुष्य प्रकृति के कार्यों को करता है वह परम् ब्रम्ह में विलीन हो जाता है । यह
मनुष्य शरीर द्वारा उत्थान के प्रयत्नों की चर्मोत्कर्ष उपलब्धि होती है ।
बुधवार, 24 दिसंबर 2014
ज्ञान भक्ति कर्म
परम् ब्रम्ह इस सृष्टि के समस्त
कार्यों को प्रकृति के माध्यम से कर रहे हैं । एकाकी मनुष्य मात्र यंत्रवत्
प्रकृति के कार्यों को करने का अधिकारी होता है । यह ज्ञान है । परम् सत्य को
समर्पित रहना भक्ति है । भक्ति से युक्त होकर प्रकृति के कार्यों को करने वाला
व्यक्ति परम् द्रम्ह में लीन होता है । यह मनुष्य शरीर द्वारा उत्थान के प्रयत्नों
की चर्मोत्कर्ष उपलब्धि होती है ।
मंगलवार, 23 दिसंबर 2014
लोक संग्रह हेतु
मुक्त मनुष्य अपने कर्म दायित्वों
को ईश्वर के आदेश के रूप में ग्रहण कर संसार के समस्त जीवों के हित के लिये ईश्वर
की सेवा के भाव से करता है । यह मनुष्य शरीर द्वारा अपने उत्थान के लिये किये गये
प्रयत्नों की सर्वोच्च उपलब्धि होती है ।
सोमवार, 22 दिसंबर 2014
बंधन से मुक्ति
जिसभी मनुष्य ने अपनी इच्छाओं से
मुक्त होकर, अपने अहंकार का त्याग करके, अपने समस्त कार्यों को ईश्वर की
सेवा समझ कर करता है वह समस्त कर्म बंधनों से मुक्त हो जाता है । मनुष्य द्वारा
अपने उत्थान के लिये किये गये समस्त प्रयत्नों की यही चर्मोंत्कर्ष उपलब्धि होती
है ।
रविवार, 21 दिसंबर 2014
पूर्णता का चर्मोत्कर्ष
मनुष्य शरीर द्वारा पूर्णता प्राप्त करने का अंतिम पडाव
होता है, जब वह बिना कर्म फल की कामना किये अपने समस्त कर्म
दायित्वों का सम्पादन करने लगता है । दूसरे शब्दों में मनुष्य जब बिना कर्मफल की
कामना किये अपने कर्म दायित्वों को करने लगता है तो यह उसकी इस मानव शरीर द्वारा
चर्मोत्कर्ष उपलब्धि होती है ।
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