मंगलवार, 3 नवंबर 2015

तपस्या

मनुष्य के अंदर विद्यमान सत्य अस्तित्व आत्मा जब विजातीय असत् प्रकृति के साथ मोंह सम्बंध कर लेती है तो फलत: अस्थिरता, उद्विग्नता, अनिश्चय की मानसिक स्थितियाँ जन्म लेती हैं । गुरू द्वारा सुझाये गये निदान, मोंह का त्याग करने में क्लेष उठाना पडता है । इसी को तपस्या कहा जाता है । परंतु सत्य को पाने के लिये तपस्या अनिवार्य होती है । 

बुधवार, 21 जनवरी 2015

वैयक्तिक ईश्वर

वैयक्तिक ईश्वर परम् सत्य नहीं होता है । मनुष्य अपनी सीमित बुद्धि से जब परम् सत्य की कल्पना अपनी धारणा में स्थिर करने की चेष्टा करता है तो वह वैयक्तिक ईश्वर की कल्पना ही संजो पाता है । बौद्धिक ज्ञान और नैसर्गिक ज्ञान में यही  भेद होता है । परम् सत्य का वास्तविक अनुभव मिलने परही मनुष्य को अपनी बौद्धिक क्षमता की सीमित क्षमता का सही आभास मिलता है । परम् सत्य रूपों के संसार का रचयिता भी है रक्षक भी है । इसी रक्षक स्वरूप को वैयक्तिक ईश्वर की संज्ञा प्रदान की जाती है । 

मंगलवार, 20 जनवरी 2015

देवलोक

रूपों के संसार की उच्चतम् सीमा होती है ब्रम्हलोक देवलोक । देवताओं का संसार । यह परम् सत्य नहीं होता है । यह मात्र रूपों के संसार की अंतिम सीमा का ज्ञोतक होता है । इस लोक तक के प्रत्येक रूप में परम् सत्य छिपा होता है । परंतु वह रूप उस परम् सत्य की उपस्थिति से अनभिज्ञ होते हैं । उसी छिपे हुये परम् सत्य को जानना ही प्रत्येक रूप के लिये सर्वोच्च लक्ष्य होता है । जिस समय स्थल पर प्रत्येक रूप उस छिपे हुये परम् सत्य को जान जावेंगे इस संसार की उत्पत्ति का लक्ष्य पूरा हो जावेगा । उस समय स्थल पर पूरा संसार उस परम् सत्य में विलय कर जावेगा । 

सोमवार, 19 जनवरी 2015

विज्ञान और आनंद

इस रूपों के संसार में प्रत्येक रूप के सृजन का विज्ञान होता है । रूप का सृजन विज्ञान द्वारा ही सम्भव हुआ है । आनंद मुक्त दशा है । आनंद परम् सत्य नहीं है । अपने अंदर विद्यमान परम् सत्य का अनुभव मिलने पर अनुभूति आनंद की दशा सृजित करती है । आत्मा जबतक परवश प्रकृति के मोंह से बँधा है त्रसित दशा का भोक्ता रहता है । मुक्त आत्मा आनंद भोग करती है । आनंद मनुष्य के विकास की उच्चतम् सीमा होता है । 

रविवार, 18 जनवरी 2015

सर्वोच्च ज्ञेय

इस संसार के समस्त रूपों में समाया हुआ है परम् सत्य । उस परम् सत्य के इन रचनाओं में निहित विज्ञान की महिमा कि ये समस्त रूप उस छिपे हुये परम् सत्य को अहसास नहीं कर पाते हैं । इसी समस्त रूपों में छिपे हुये परम् सत्य को जानना ही सर्वोच्च ज्ञेय होता है । 

शनिवार, 17 जनवरी 2015

पूर्णता का संसार

परम् सत्य ने इस संसार के लिये जो लक्ष्य निर्धारित किया है और प्रकृति उस लक्ष्य की पूर्णता के लिये प्रत्येक व्यक्ति को अवसर प्रदान करती है वह लक्ष्य होता है उस परम् सत्य को जानना । तर्क यह प्रश्न उत्पन्न करता है कि उपरोक्त लक्ष्य की प्राप्ति के उपरांत इस संसार का क्या स्वरूप होगा । यह कहना कठिन है । वह परम् सत्य जो असँख्य सम्भावनाओं का धारक है सम्भवतया अपने को व्यक्त करने के लिये किसी भिन्न सम्भावना को प्रस्तुत करेगा । 

शुक्रवार, 16 जनवरी 2015

मुक्त कर्म

मुक्त आत्मा के व्यक्ति अपने शरीर के रहते तक कर्म करते हैं परंतु उनके कर्म अपनी इच्छा अथवा कर्तापन की सीमाओं से परे होते हैं । वह प्रकृति के आदेशित कर्मों को बिना कर्म के कारण के साथ सम्बंध जोडे और बिना फल की कामना के विचार से बँधे होते हैं । 

गुरुवार, 15 जनवरी 2015

आत्मलोक

मुक्त आत्मा के लोग अपने को, समय के चक्र से परे के परम् सत्य के साथ जोडे हुये, इस संसार में एक एकाकी शरीर धारण किये हुये अवश्य रहते हैं, परंतु उनकी आत्मा लगातार उसी परम् सत्य के साथ जुडी रहती है जिससे उनकी आत्मा की व्यापकता क़ायम रहती है । 

बुधवार, 14 जनवरी 2015

परम् सत्य की खोज़

परम् सत्य की खोज़ चलती ही रहेगी जब तक पूरा मानव समाज जो कि अज्ञान के अंधकार में भटक रहा है पूर्णरूप से दोषों से मुक्त नहीं हो जावेगा और परम् सत्य के ज्ञान ज्योति से प्रकाशित नहीं हो जावेगा । 

मंगलवार, 13 जनवरी 2015

प्रकृतिलीन:

मुक्त आत्मा के व्यक्ति अपने को इस प्रकृति निर्मित शरीर को धारण कर प्रकृति की देन को ग्रहण करते हुये भी सतत् परम् सत्य के साथ सीधे सम्पर्क में रहते हैं और उसके आदेश से समूचे मानव समाज को मोंह कि स्थिति से उत्थान कर मुक्ति की स्थिति तक पहुँचने के लिये कार्य करते हैं । 

सोमवार, 12 जनवरी 2015

शरीर मस्तिष्क प्राण

सिद्धपुरुष की शरीर, मस्तिष्क और प्राण परम् सत्य के अवतरण के लिये एक अनुकूल माध्यम बन जाते हैं जोकि दैवीय ज्योति से प्रकाशित होते हैं । उसका व्यक्तित्व विकसित होकर प्रकाशित अभिव्यक्ति, स्वतंत्र, शुद्ध, मुक्त और दोष से रहित बन जाता है । ऐसा व्यक्ति लोक कल्याण के लिये कार्य करता है । मुक्त आत्मा का व्यक्ति समूचे मनुष्य समुदाय के प्रत्येक मनुष्य को मुक्त आत्मा बनाने के लिये सचेष्ट होता है ।  

रविवार, 11 जनवरी 2015

पूर्ण तारतम्य

मुक्त आत्मा के मनुष्य सिद्धपुरुष की शरीर, मस्तिष्क और आत्मा एक तारतम्य में प्रतिपल बिना किसी त्रुटि के कार्य करते है । उसका कोई भी कार्य चाहे वह चेतन दशा में किया गया होवे, अथवा अर्धचेतन दशा में किया गया होवे, अथवा अचेतन दशा में किया गया होवे उनमें बिना किसी अपवाद के उसकी शरीर, मस्तिष्क और आत्मा एक तारतम्य में ही पाये जाते हैं । 

शनिवार, 10 जनवरी 2015

सिद्ध पुरुष

मुक्त आत्मा अपने उद्गम श्रोत ब्रम्ह के प्रतिनिधि के रूप में आचरण करे । मुक्त आत्मा ब्रम्ह की प्रेरणा द्वारा कार्य करे । मुक्त आत्मा ब्रम्ह की शक्ति द्वारा कार्य करे । यह ब्रम्ह में विलय का स्वरूप होगा । जो भी मनुष्य इस स्थिति को प्राप्त कर सके वह सिद्ध पुरुष होगा । एक ऐसा पुरुष जिसके लिये ब्रम्ह सदैव विद्यमान है । 

शुक्रवार, 9 जनवरी 2015

ब्रम्हमय प्रकृति

आत्मा ग्रसित होती है प्रकृतीय मोंह द्वारा इसलिये ज्ञानी पुरुषों ने आत्मा को प्रकृतीय मोंह से उबारने का उपाय बताते हुये सुझाव देते हैं कि मनुष्य अपनी प्रकृति को ही ब्रम्हमय बनावे ताकि आत्मा मुक्त दशा में रह सके । प्रकृति प्रतिपल ब्रम्ह के ध्यान व अनुशासन में रहे । यह अभ्यास द्वारा सम्भव होगा । 

गुरुवार, 8 जनवरी 2015

जीवनमुक्त

प्रकृतीय मोंह से मुक्त आत्मा परम् सत्य के रूप को प्रगट करती है । प्रकृतीय गुणों के लोक से ऊपर स्वतंत्रता एवं आनंद की स्थिति है । मुक्त आत्मा प्रकृति द्वारा आदेशित कर्मों का प्रेरण करती है परंतु उनमें लिप्त नहीं होती है । यही स्थिति आत्मा के कर्म प्रेरण की आदर्श स्थिति कही गयी है । यही स्थिति पाना प्रत्येक व्यक्ति के लिये प्रकृति द्वारा लक्ष्य निर्धारित है । इसी स्थिति तक समूचे मानव समाज को पहुँचाना इस संसार की प्रकृति के लिये लक्ष्य निर्धारित है । 

बुधवार, 7 जनवरी 2015

ब्रम्ह सदृष्य

आत्मा का प्रकृतीय मोंह से मुक्त स्थिति ही आत्मा का ब्रम्ह के स्तर में उन्नति का ज्ञोतक होता है । आत्मा जिस भी शरीर में स्थिति है उस शरीर की प्रकृति आत्मा के ऊपर मोंह का वातावरण सृजित करती है । इसी प्रकृति के आच्छादन से आत्मा की रक्षा करना और उसे उसके मौलिक स्वरूप में स्थिर रखना ही आत्मा का ब्रम्हलोक में उत्थान है । 

मंगलवार, 6 जनवरी 2015

कैवल्य

इस संसार की प्रत्येक गति प्रकृति और पुरुष की परस्पर क्रिया का परिणाम होती है । इसलिये गतियों के प्रेरक पुरुष की यथास्थिति महत्वपूर्ण होती है । आत्मा जब प्रकृतीय मोंह से मुक्त होता है तभी उसका कर्म प्रेरण ब्रम्ह की गरिमा के अनुरूप होता है । अन्यथा की परिस्थितियों में आत्मा का कर्म प्रेरण दोषपूर्ण होता है । कर्म संविधान के प्रतिकूल होता है । आदर्ष स्थिति अर्थात् कर्म संविधान के अनुकूल कर्म प्रेरण आत्मा के लिये आदर्ष लक्ष्य होता है ।  

सोमवार, 5 जनवरी 2015

सत्य अनुभव

मनुष्य द्वारा अपने अंदर विद्यमान परम् सत्य का सत्य अनुभव पाना ही जीवन की सर्वोत्कृष्टि उपलब्धि होती है । उस सत्य अनुभव तक पहुँचने के लिये तथा उस सत्य अनुभव के प्राप्त होने के उपरांत भी उसे व्यक्त करने के यत्न के लिये बौद्धिक ध्यान, भक्ति-पूर्ण समर्पण तथा योगावस्था में कार्य यह सभी मात्र साधन हैं । 

रविवार, 4 जनवरी 2015

ब्रम्ह निर्वाण

जिस मनुष्य में आत्मचेतना जागृत हो गई है । जिस मनुष्य को अपने अंत:करण में समस्त आनंद की अनुभूति अनुभव होने लगी है । जो मनुष्य अपनी आत्मानुभूति में हर्षित रहता है । जिस मनुष्य को अपने अंत:करण में ज्ञान ज्योति के दर्शन मिलने लगाते हैं । ऐसे योगी को ब्रम्ह की स्थिति प्राप्त होती है । 

शनिवार, 3 जनवरी 2015

अखण्ड समर्पण

योगेश्वर श्रीकृष्ण बताते हैं कि जो भी मनुष्य मुझमें अखण्ड समर्पित भाव से युक्त हो अपने को प्रस्तुत करता है वह प्रकृतीय गुणों के बंधन से मुक्त हो जाता है । मुक्ति के परिणाम से वह मुझमें विलय के लिये योग्य पात्र बन जाता है । 

शुक्रवार, 2 जनवरी 2015

योगी का जीवन

एक योगी का स्वरूप हर्ष, पवित्रता, आत्मचेतना, मोंह से मुक्ति, कर्म के लिये साहस एवं शक्ति और सतत् ब्रम्ह के ध्यान में संलग्न होता है । योगी का अस्तित्व सात्विक आचरण और विवेक का जीवित उदाहरण होता है । मनुष्य का जीवन स्वार्थ और मोंह से ऊपर उठ एक नये उच्च आदर्शों के धरातल पर जीने का स्वरूप एक योगी का जीवन होता है । मनुष्य शरीर द्वारा उत्थान के प्रयत्नों में यह चर्मोत्कर्ष उपलब्धि होती है । 

गुरुवार, 1 जनवरी 2015

निर्वाण

बौद्ध धर्म में निर्वाण पूर्णता की स्थिति को कहा जाता है । शंकर निर्वाण को मोक्ष बताते हैं । निर्वाण सर्वोच्च आनंद की स्थिति को कहा गया है । ब्रम्ह में आत्मा का विलय निर्वाण । निर्वाण की स्थिति मिल जाने पर पुन: प्रकृतीय मोंह में वापस लौटने की सम्भावना नहीं रह जाती है । मनुष्य शरीर द्वारा उत्थान के प्रयत्नों में यह चर्मोत्कर्ष उपलब्धि होती है ।