सिद्धपुरुष की शरीर, मस्तिष्क और प्राण परम् सत्य के अवतरण के लिये एक अनुकूल माध्यम बन जाते हैं
जोकि दैवीय ज्योति से प्रकाशित होते हैं । उसका व्यक्तित्व विकसित होकर प्रकाशित
अभिव्यक्ति, स्वतंत्र, शुद्ध, मुक्त और दोष से रहित बन जाता है । ऐसा व्यक्ति लोक
कल्याण के लिये कार्य करता है । मुक्त आत्मा का व्यक्ति समूचे मनुष्य समुदाय के
प्रत्येक मनुष्य को मुक्त आत्मा बनाने के लिये सचेष्ट होता है ।
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