बुधवार, 21 जनवरी 2015

वैयक्तिक ईश्वर

वैयक्तिक ईश्वर परम् सत्य नहीं होता है । मनुष्य अपनी सीमित बुद्धि से जब परम् सत्य की कल्पना अपनी धारणा में स्थिर करने की चेष्टा करता है तो वह वैयक्तिक ईश्वर की कल्पना ही संजो पाता है । बौद्धिक ज्ञान और नैसर्गिक ज्ञान में यही  भेद होता है । परम् सत्य का वास्तविक अनुभव मिलने परही मनुष्य को अपनी बौद्धिक क्षमता की सीमित क्षमता का सही आभास मिलता है । परम् सत्य रूपों के संसार का रचयिता भी है रक्षक भी है । इसी रक्षक स्वरूप को वैयक्तिक ईश्वर की संज्ञा प्रदान की जाती है । 

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