मंगलवार, 6 जनवरी 2015

कैवल्य

इस संसार की प्रत्येक गति प्रकृति और पुरुष की परस्पर क्रिया का परिणाम होती है । इसलिये गतियों के प्रेरक पुरुष की यथास्थिति महत्वपूर्ण होती है । आत्मा जब प्रकृतीय मोंह से मुक्त होता है तभी उसका कर्म प्रेरण ब्रम्ह की गरिमा के अनुरूप होता है । अन्यथा की परिस्थितियों में आत्मा का कर्म प्रेरण दोषपूर्ण होता है । कर्म संविधान के प्रतिकूल होता है । आदर्ष स्थिति अर्थात् कर्म संविधान के अनुकूल कर्म प्रेरण आत्मा के लिये आदर्ष लक्ष्य होता है ।  

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें