इस संसार की प्रत्येक गति प्रकृति
और पुरुष की परस्पर क्रिया का परिणाम होती है । इसलिये गतियों के प्रेरक पुरुष की
यथास्थिति महत्वपूर्ण होती है । आत्मा जब प्रकृतीय मोंह से मुक्त होता है तभी उसका
कर्म प्रेरण ब्रम्ह की गरिमा के अनुरूप होता है । अन्यथा की परिस्थितियों में
आत्मा का कर्म प्रेरण दोषपूर्ण होता है । कर्म संविधान के प्रतिकूल होता है । आदर्ष
स्थिति अर्थात् कर्म संविधान के अनुकूल कर्म प्रेरण आत्मा के लिये आदर्ष लक्ष्य होता
है ।
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