प्रकृतीय मोंह से मुक्त आत्मा परम्
सत्य के रूप को प्रगट करती है । प्रकृतीय गुणों के लोक से ऊपर स्वतंत्रता एवं आनंद
की स्थिति है । मुक्त आत्मा प्रकृति द्वारा आदेशित कर्मों का प्रेरण करती है परंतु
उनमें लिप्त नहीं होती है । यही स्थिति आत्मा के कर्म प्रेरण की आदर्श स्थिति कही
गयी है । यही स्थिति पाना प्रत्येक व्यक्ति के लिये प्रकृति द्वारा लक्ष्य
निर्धारित है । इसी स्थिति तक समूचे मानव समाज को पहुँचाना इस संसार की प्रकृति के
लिये लक्ष्य निर्धारित है ।
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