मनुष्य शरीर में विद्यमान परम्
सत्य का अंश प्रकृतीय मोंह में आसक्त है । आत्मा को विषेस प्रयत्नों के द्वारा यदि
व्याप्त प्रकृतीय मोंह से मुक्त किया जाय तो वह अपने मूल स्वरूप परम् सत्य की
गरिमा के समतुल्य हो जाता है । वह व्यक्ति इस पृथ्वी पर मनुष्य स्वरूप में परम्
सत्य का रूप बन जाता है । मनुष्य शरीर द्वारा उत्थान के प्रयत्नों में यह
चर्मोत्कर्ष उपलब्धि होती है ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें