रविवार, 28 दिसंबर 2014

ब्रम्ह के समरूप

मनुष्य शरीर में विद्यमान परम् सत्य का अंश प्रकृतीय मोंह में आसक्त है । आत्मा को विषेस प्रयत्नों के द्वारा यदि व्याप्त प्रकृतीय मोंह से मुक्त किया जाय तो वह अपने मूल स्वरूप परम् सत्य की गरिमा के समतुल्य हो जाता है । वह व्यक्ति इस पृथ्वी पर मनुष्य स्वरूप में परम् सत्य का रूप बन जाता है । मनुष्य शरीर द्वारा उत्थान के प्रयत्नों में यह चर्मोत्कर्ष उपलब्धि होती है । 

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