मनुष्य शरीर द्वारा पूर्णता प्राप्त करने का अंतिम पडाव
होता है, जब वह बिना कर्म फल की कामना किये अपने समस्त कर्म
दायित्वों का सम्पादन करने लगता है । दूसरे शब्दों में मनुष्य जब बिना कर्मफल की
कामना किये अपने कर्म दायित्वों को करने लगता है तो यह उसकी इस मानव शरीर द्वारा
चर्मोत्कर्ष उपलब्धि होती है ।
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