जिस मनुष्य को अपनी आत्मा का सत्य
अनुभव मिल जाता है । उसकी आत्मा अपने को ब्रम्ह स्वरूप में लीन पाती है । उसका यह
अनुभव एक सत्य अनुभूति बन जाती है । इसी अनुभूति की स्थिति तक पहुँचाना ही धर्म
दर्शन का लक्ष्य होता है । मनुष्य शरीर द्वारा उत्थान के प्रयत्नों में यह
चर्मोत्कर्ष उपलब्धि होती है ।
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