जिसभी मनुष्य ने अपनी इच्छाओं से
मुक्त होकर, अपने अहंकार का त्याग करके, अपने समस्त कार्यों को ईश्वर की
सेवा समझ कर करता है वह समस्त कर्म बंधनों से मुक्त हो जाता है । मनुष्य द्वारा
अपने उत्थान के लिये किये गये समस्त प्रयत्नों की यही चर्मोंत्कर्ष उपलब्धि होती
है ।
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