परम् ब्रम्ह का स्मरण मस्तिष्क में
धारण कर, अपने पूर्ण विवेक को परम् ब्रम्ह में केंद्रित कर, परम् ब्रम्ह को जानना और पाना
अपने जीवन का लक्ष्य निर्धारित कर, परम् ब्रम्ह को ही अपनी भक्ति का वस्तु बना कर जो भी
मनुष्य प्रकृति के कार्यों को करता है वह परम् ब्रम्ह में विलीन हो जाता है । यह
मनुष्य शरीर द्वारा उत्थान के प्रयत्नों की चर्मोत्कर्ष उपलब्धि होती है ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें